Fathers Day Special: भारतीय सिनेमा में पिता के किरदार का बदलता रूप, सख्त पिता से इमोशनल साथी तक का सफर!
- June 22, 2026
- Ultra Team
Father’s Day के इस मौके पर जब हम अपने जीवन में पिता की भूमिका को याद करते हैं, तो हिंदी सिनेमा (Hindi cinema) का एक पहलू भी सामने आता है, फिल्मों में ‘पिता’ का किरदार,(Character of the ‘Father) जो समय के साथ लगातार बदलता रहा है। जब मैं पीछे मुड़कर हिंदी सिनेमा को देखता हूं, तो एक बात हमेशा ध्यान खींचती है, फिल्मों में ‘पिता’ की छवि हर दौर के साथ एक नया रूप लेती गई है।
पहले के दौर में पिता का मतलब अक्सर सख्ती और जिम्मेदारी होता था। दिलीप कुमार की ‘शक्ति (1982)’ और मनोज कुमार की ‘शोर ‘ जैसी फिल्मों में पिता अपने कर्तव्य को सबसे ऊपर रखते थे। उनका स्वभाव सख्त जरूर था, लेकिन उस सख्ती के पीछे अपने बच्चों के लिए एक गहरा फर्ज और प्यार छिपा होता था।
इसी दौर में मह्मूद की ‘कुंवारा बाप’ ने पिता के एक बिल्कुल अलग और बेहद भावुक रूप को सामने रखा, जहां एक पिता का त्याग और संघर्ष दिल को छू जाता है।
90 के दशक में आते-आते यह सख्ती थोड़ी नरम पड़ने लगी, लेकिन सम्मान वैसा ही बना रहा। अमरीश पुरी की ‘विरासत’ और ‘पर्देस’ जैसी फिल्मों में पिता सख्त जरूर हैं, लेकिन परिवार की जड़ों और संस्कारों को बचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होती है। खास बात यह है कि चाहे टकराव हो, लेकिन बच्चों के मन में उनके लिए सम्मान हमेशा बना रहता है।
वहीं राजेश खन्ना की ‘स्वर्ग’ और ‘हीरो नं. 1’ जैसी फिल्मों में कादर खान जैसे कलाकारों के जरिए पिता का एक हल्का-फुल्का, अपनापन भरा रूप भी देखने को मिला, जहां रिश्तों में दूरी कम और जुड़ाव ज्यादा नजर आता है।
इसके बाद फिल्मों में पिता का किरदार और भी मानवीय हो गया!
अमिताभ बच्चन की ‘वक्त: रेस अगेंस्ट टाइम’ और अनुपम खेर की ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ जैसी फिल्मों में पिता सिर्फ सख्त या परफेक्ट नहीं हैं, बल्कि वो सीखते हैं, बदलते हैं और अपने रिश्तों को समझने की कोशिश करते हैं।
आज के दौर में यह रिश्ता एक अलग ही स्तर पर पहुंच चुका है। ऋतिक रोशन स्टारर ‘क्रिश 3’ जैसी फिल्मों में पिता और बेटे का रिश्ता सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि एक विरासत की तरह भी दिखाया गया है, जहां जिम्मेदारी और रिश्ते दोनों साथ चलते हैं।
अगर पूरे सफर को देखा जाए, तो एक बात साफ नजर आती है, पिता का किरदार कभी कमजोर नहीं हुआ, बस वक्त के साथ उसका अंदाज़ बदलता गया।
मेरे लिए, सिनेमा में पिता का रिश्ता हमेशा सबसे भावनात्मक रहा है, क्योंकि यह ऐसा रिश्ता है जिसे हर कोई अपने तरीके से महसूस करता है। शायद यही वजह है कि चाहे राज कपूर की ‘धर्म कर्म’ हो या कपूर परिवार की ‘कल आज और कल’ , हर दौर में यह रिश्ता दर्शकों से जुड़ता रहा है।
आज के डिजिटल दौर में, ऐसी कई क्लासिक फिल्में अल्ट्रा प्ले ओटीटी जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आसानी से उपलब्ध हैं, जहां नई पीढ़ी भी इन कहानियों और किरदारों से जुड़ पा रही है। आखिर में, सिनेमा हमें यही सिखाता है कि पिता सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि एक एहसास हैं, जो समय के साथ बदलते जरूर हैं, लेकिन कभी कम नहीं होते।